चाँद तक पहुँचा भारत, फिर भी जाति की बेड़ियाँ क्यों? मैनुअल स्कैवेंजिंग पर बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियाँ हमें गर्व से भर देती हैं। लेकिन इसी देश में जब किसी व्यक्ति को अपनी आजीविका के लिए अमानवीय परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, तो हमारी प्रगति के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा होता है—विकास का लाभ और सम्मान आखिर हर नागरिक तक कब पहुँचेगा? बॉम्बे हाईकोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा जारी रहने पर महाराष्ट्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए इसी विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया। अदालत की टिप्पणी का आशय था कि हम चाँद तक पहुँचने पर गर्व करते हैं, जबकि जाति व्यवस्था आज भी कुछ नागरिकों को मानवीय गरिमा के विरुद्ध परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर करती है। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे की पीठ ने इस प्रथा के बने रहने और संबंधित कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन पर चिंता जताई। स्रोत: लाइव लॉ इस खबर के साथ दिखाई गई तस्वीर हमें ठहरकर सोचने के लिए मजबूर करती है। सीवर के भीतर मौजूद व्यक्ति का दृश्य हमारे सामने उस श्रम को लाता है, जिसे शहरों की रोजमर्रा की सुविधा के बीच अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। साफ सड़कें और व्यवस्थित इमारतें देखकर संतुष्ट हो जाना ...