हर बहस जीतना ज़रूरी नहीं | “मूर्ख से बहस करने पर मूर्खों की संख्या दो हो जाती है।”
हर बहस जीतना ज़रूरी नहीं कभी ऐसा हुआ है कि किसी को अपनी बात समझाते-समझाते आपका मन अशांत हो गया हो? आपने तर्क दिए, उदाहरण रखे और सामने वाले की शंकाओं का उत्तर भी दिया, लेकिन बातचीत वहीं घूमती रही। कुछ देर बाद विषय पीछे छूट गया और सवाल बस इतना रह गया—आखिरी बात कौन कहेगा? चित्र में लिखा संदेश इसी स्थिति पर चोट करता है: “मूर्ख से बहस करने पर मूर्खों की संख्या दो हो जाती है।” यह कथन हमें अपनी प्रतिक्रियाओं पर विचार करने का अवसर देता है। जब किसी बातचीत में सुनने, समझने और अपनी गलती स्वीकार करने की गुंजाइश समाप्त हो जाए, तब उसमें उलझे रहकर हम भी अपना विवेक खो सकते हैं। चित्र में आमने-सामने रखे दो ध्वनि-विस्तारक दिखाई देते हैं। उनके बीच आवाज़ की तरंगें उलझ रही हैं और नीचे टूटे हुए घड़े बिखरे पड़े हैं। इसे संवाद के बिगड़ने के एक रूपक की तरह देखा जा सकता है। दोनों पक्ष अपनी आवाज़ दूसरे तक पहुँचाना चाहते हैं, लेकिन सुनने के लिए कोई ठहरता नहीं। उलझी तरंगें बढ़ती गलतफहमी और टूटे घड़े रिश्तों, भरोसे तथा सम्मान को पहुँचने वाली चोट का संकेत लगते हैं। हमारे जीवन की कई बहसें भी ऐसा ही रूप ले लेती...